Allama Iqbal Shayari

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jafa jo ishq me hoti

jafa jo ishq me hoti

जफ़ा जो इश्क़ में होती है वो जफ़ा ही नहीं
सितम न हो तो मोहब्बत में कुछ मज़ा ही नहीं

नशा पिला कर गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो जब है के गिरतों को थाम ले साक़ी

mere bachpan ke din bhi

mere bachpan ke din bhi

मेरे बचपन के दिन भी क्या ख़ूब थे इक़बाल
बेनमाज़ी भी था और बेगुनाह भी

दिल से जो बात निकलती है अस़र रखती है
पर नहीं ताक़ते परवाज़ मगर रखती है

na tu jami ke liye

na tu jami ke liye

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए

सुबह को बाग़ में शबनम पड़ती है फ़क़त इसलिए
के पत्ता पत्ता करे तेरा ज़िक्र बा वजू हो कर

hansi aati hai

hansi aati hai

हँसी आती है मुझे हसरते इंसान पर
गुनाह करता है ख़ुद लानत भेजता है शैतान पर

मैं तुझ को तुझ से ज़्यादा चाहूँगा
मगर शर्त है अपने अंदर मेरी जुस्तजु पैदा कर

kyu mannate mangta hai

kyu mannate mangta hai

क्यों मन्नतें माँगता है औरों के दरबार से इक़बाल
वो कौन सा काम है जो होता नहीं तेरे परवरदिगार से

अल्लाह को भूल गए लोग फ़िक्र रोज़ी में
तलाश रिज़्क़ की है राज़िक का ख़्याल ही नहीं